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“प्रधान को हटाकर ‘प्रधानमंत्री’ को बचा लिया…” अखिलेश यादव ने सरकार को घेरा

Anti Paper Leak Bill 2026

Anti Paper Leak Bill 2026: लोकसभा में बोलते हुए समाजवादी पार्टी के सांसद अखिलेश यादव ने कहा कि आंदोलन को बहुत दूर से देख रहा था. उस आंदोलन में जीत के बाद एक नारा लगा, सरकार के खिलाफ नारा लगा कि सरकार को अहंकार था कि सरकार झुकती नहीं है. नई पीढ़ी ने नारा दिया कि सरकार भी झुकती है झुकाने वाला चाहिए. सरकार ने हर विषय को स्वीकार किया, लेकिन सदन में उन विषयों को क्यों नहीं रखा जिसपर सहमति बने. जब मंत्री (पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान) संसद पहुंचे, तो सदन के बाहर उनका स्वागत किया गया…सोचिए सदस्यों को कितनी बड़ी राहत मिली होगी और वे किस बड़े संकट से बच गए. एक ‘प्रधान’ को हटाकर, आपने ‘प्रधानमंत्री’ को बचा लिया. यह सरकार कई सालों से नकारात्मक राजनीतिक करती रही थी. कितने हजार करोड़ रुपये नकारात्मक प्रचार के लिए खर्चा किया, लेकिन मैं युवा पीढ़ी को बधाई देता जिसने सरकार को झुका दिया.

“इसके बाद भी परिवर्तन होगा”
अखिलेश यादव की बात को बीच में काटते हुए लोकसभा में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि कौन सी स्थिति बेहतर है वह जिसमें सरकार छात्रों के विरोध को सुनकर संसद में बिल पेश करती है, या वह जिसमें सरकार विरोध को कुचलने के लिए देश भर में इमरजेंसी लगा देती है? जवाब में अखिलेश यादव ने कहा कि मैंने इमरजेंसी को खुद नहीं देखा, लेकिन जो तब हुआ था, उसकी झलक हमने यहीं राष्ट्रीय राजधानी में देखी है. आसूं गैस के गोले छोड़े गए, कील लगी लाठी से छात्रों को मारा गया, उस समय करंट नहीं लगाया जाता था, इस समय करंट लगाया गया. ये हमला भी इमरजेंसी के बराबर ही हुआ है. इमरजेंसी की ही अगर सत्ता पक्ष को याद आ गई तो मैं कहना चाहूंगा इमरजेंसी के बाद भी परिवर्तन हुआ था, हमें भरोसा है कि इसके बाद भी परिवर्तन होगा. मुद्दा कानून का नहीं है, आपकी नीयत साफ़ नहीं है. जिस पल आपकी नीयत साफ़ हो जाएगी, परीक्षा की प्रक्रिया भी पारदर्शी हो जाएगी.

“सरकार घबरा और डर जाती है तो मांगें मान लेती है”
समाजवादी पार्टी प्रमुख ने आगे कहा कि मुझे उम्मीद है कि युवाओं और नौजवानों ने जो भी मांगें रखी हैं, सरकार उन सभी मांगों को मान लेगी. सरकार ने यह भी मान लिया होगा कि कोई भी पार्टी, जो मज़ाक के तौर पर शुरू होती है, वह एक बड़ी पार्टी बन सकती है. जो चीज मज़ाक के तौर पर शुरू हुई थी, वह इतनी गंभीर हो गई कि हमारी सरकार इतनी लोकतांत्रिक हो गई कि उन्हें धरने पर बैठने की इजाज़त दे दी. हमने ऐसा समय भी देखा है जब लोगों को धरने पर बैठने की इजाजत नहीं मिलती थी. सालों तक लोग धरने पर बैठे रहे, लेकिन उनकी आवाज नहीं सुनी गई. दिल्ली को किसानों ने घेर लिया था. सरकार को लगा कि चुनाव आने वाले हैं, और फिर उसने तीनों काले कानून वापस ले लिए. जब ​​सरकार घबरा जाती है और डर जाती है, तो वह मांगें मान लेती है.

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