Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धार्मिक वजह से वंदे मातरम न गाना अपराध नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कानून पर केंद्र से जवाब मांगा है। देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, धार्मिक कारणों से राष्ट्रगीत न गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए।” यह टिप्पणी गायक टीएम कृष्णा की ओर से वंदे मातरम से जुड़े प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। मामला उस कानून से जुड़ा है, जिसमें वंदे मातरम के गायन को रोकने या गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय बनाया गया है।
47 दिन पहले ही बना कानून
बता दें कि वंदे मातरम् को इस कानून के दायरे में लाने वाला संशोधन 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा ने बिल पास किया था। इसके बाद 47 दिन पहले 6 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर यह कानून बना। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह जांचने पर सहमति दी कि वंदे मातरम न गाने को दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं। कोर्ट ने यह तय करने से इनकार किया कि राष्ट्रगीत केवल दो अंतरों तक सीमित रहेगा या छह अंतरों तक होगा।
बिजो एमैनुअल केस में तीन छात्रों ने राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वंदे मातरम् से जुड़े कानून की व्याख्या करते समय 1986 के ‘बिजो एमैनुअल’ फैसले में तय सिद्धांतों को लागू किया जाएगा। जानकारी के अनुसार 1986 के बिजो एमैनुअल बनाम केरल सरकार मामले में तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने के आधार पर उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।
‘नक्सली’ शब्द पर सॉलिसिटर जनरल और मुरलीधर में बहस
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कृष्णा के वकील सीनियर एडवोकेट डॉ एस मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी हुई। संविधान के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया पर मुरलीधर की दलील के जवाब में मेहता ने ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया। याचिकाकर्ता के वकील मुरलीधर ने नक्सल शब्द पर कहा कि अभी आपने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, उसे वापस लें। यह कार्यवाही लाइव चल रही है। मैं इसका कड़ा विरोध करता हूं। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने जवाब दिया- मैंने कहा कि यही संवैधानिक तरीका है, न कि वह तरीका जो नक्सली चाहता है। और मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है। मुरलीधर – “किसी बात पर विचार करना नक्सली होना नहीं है। इसके बाद जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति पर आतंकवादी होने का आरोप हो, तब भी संविधान के तहत उसके अधिकार बने रहते हैं।
2026 वंदे मातरम के अपमान पर कानून बना
बता दें कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत घोषित किया था। लंबे समय तक इसके अपमान पर कोई अलग कानून नहीं था, लेकिन 2026 के मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम बनाया। इस कानून के तहत वंदे मातरम के गायन को जानबूझकर रोकने, इसमें बाधा डालने या इसका सार्वजनिक अपमान करने को दंडनीय अपराध माना गया है। ऐसा करने पर 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। इस बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार लाल किले की प्राचीर से श्वंदे मातरमश् के पूरे 6 छंद गाए गए।
केंद्र का आदेश- पहले वंदे मातरम, फिर जन गण मन होगा
गृह मंत्रालय ने 9 जुलाई को सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों को राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के गायन और बजाने को लेकर नए निर्देश जारी किए थे। इसमें दोनों के सही बोल, उच्चारण और तय प्रोटोकॉल का पालन करने को कहा गया था। निर्देशों के मुताबिक, अगर किसी कार्यक्रम में वंदे मातरम और जन गण मन दोनों गाए या बजाए जाते हैं, तो पहले वंदे मातरम और उसके बाद राष्ट्रगान होगा। अगर किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश का अपना राज्य गीत भी है, तो पहले राज्य गीत फिर वंदे मातरम और अंत में जन गण मन रहेगा।
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