Prabodh Bodh : सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं विभिन्न साहित्यिक विधाओं में सक्रिय लेखक प्रबोध कुमार गोविल के कृतित्व और व्यक्तित्व पर आधारित पुस्तक ‘प्रबोध बोध’ का जयपुर में लोकार्पण किया गया। झालाना संस्थानिक क्षेत्र स्थित सभागार में राही सहयोग संस्थान और राजस्थान प्रौढ़ शिक्षा समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में पुस्तक पर विस्तृत चर्चा भी हुई। पुस्तक का संपादन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कृष्णा रावत और इंद्र कुमार भंसाली ने किया है। कार्यक्रम की शुरुआत से पहले संस्था के वरिष्ठ सदस्य नंद भारद्वाज की धर्मपत्नी रुक्मणी जी की स्मृति में दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
‘समय से आगे की सोच रखने वाले लेखक हैं गोविल’
कार्यक्रम की शुरुआत कविता मुखर के स्वागत उद्बोधन से हुई। इसके बाद पुस्तक के संपादक डॉ. कृष्णा रावत और इंद्र कुमार भंसाली ने ‘प्रबोध बोध’ की परिकल्पना और रचना प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्रबोध कुमार गोविल दूरगामी सोच रखने वाले लेखक हैं और उनकी वैचारिक दृष्टि कई मायनों में समय से आगे दिखाई देती है। पुस्तक के कवर पेज पर प्रकाशित तस्वीर विनोद भारद्वाज द्वारा ली गई है।
‘आइसबर्ग की तरह है गोविल का व्यक्तित्व’
साहित्यकार आभा सिंह ने पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए कहा कि इसमें प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं का उल्लेख किया गया है, लेकिन हर व्यक्तित्व एक आइसबर्ग की तरह होता है, जिसका कुछ हिस्सा ही दिखाई देता है और बड़ा हिस्सा भीतर छिपा रहता है। उन्होंने कहा कि यह बात गोविल के व्यक्तित्व पर पूरी तरह लागू होती है। आभा सिंह ने गोविल के लेखन में परंपरा और आधुनिकता के समन्वय को भी उनकी विशेषता बताया।
‘जो लिखूं, वह संजीदगी से पढ़ा जाए’
रेखा गुप्ता ने प्रबोध कुमार गोविल की उक्ति ‘जो लिखूं वह संजीदगी से पढ़ा जाए’ को रेखांकित करते हुए उनके साहित्यिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। साहित्य प्रभारी साकार श्रीवास्तव ने बताया कि कार्यक्रम में अलग-अलग स्थानों से आए साहित्यकारों ने गोविल के व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान पर अपने विचार रखे।
साहित्यकारों ने बताया ‘युगदृष्टा’ और ‘कर्मयोगी’
कार्यक्रम में साहित्यकार रतन कुमार सांभरिया, पवनेश्वरी वर्मा, डॉ. कंचना सक्सेना और दुर्गा प्रसाद अग्रवाल सहित अन्य वक्ताओं ने प्रबोध कुमार गोविल के साहित्यिक योगदान पर चर्चा की। राजेंद्र मोहन शर्मा ने गोविल को ‘युगदृष्टा’, जबकि नंद भारद्वाज ने उन्हें ‘कर्मयोगी’ बताते हुए उनके साहित्य और सक्रिय जीवन पर विचार रखे।
‘शुरुआत में पुस्तक के प्रस्ताव को कर दिया था अस्वीकार’
अपने संबोधन में प्रबोध कुमार गोविल ने बताया कि शुरुआत में उन्होंने स्वयं पर केंद्रित इस पुस्तक के प्रस्ताव को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि बाद में उनके चाहने वालों और साहित्यकारों के प्रयासों से पुस्तक अस्तित्व में आई। गोविल ने इस दौरान पुस्तक से जुड़े साहित्यकारों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
शहर के कई वरिष्ठ साहित्यकार रहे मौजूद
कार्यक्रम में विनोद भारद्वाज, हरिराम मीणा, फारुख आफरीदी, राव शिवराज सिंह, राजेंद्र बोड़ा, प्रेमचंद गांधी, वीना चौहान, मणिमाला शर्मा और आहत नज़्मी सहित शहर के अनेक साहित्यकार और गणमान्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन प्रो. नीरज रावत ने किया। अंत में डॉ. सुषमा शर्मा ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों और आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।


