Middle East war: मिडिल ईस्ट युद्ध का आज 21वां दिन है. अब ये जंग केवल जमीन और आसमान तक ही सीमित नहीं रही है बल्कि गहरे समुद्र के अंदर छिपे उस जाल तक पहुंच गई है जहां पर दुनिया का अस्तित्व टिका है. युद्ध ने एक नई और खौफनाक आशंका को जन्म दिया है. जिससे पूरी दुनिया ऑफलाइन हो सकती है. पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच अब वैश्विक विशेषज्ञों की नींद इस बात से उड़ी हुई है क्या ईरान और उसके सहयोग देश दुनिया से इंटरनेट कनेक्शन को काट सकते हैं?
बता दें कि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाली एनर्जी सप्लाई को प्रभावित किया है. इसी रास्ते से गुजरने वाले समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलों पर भी खतरा बढ़ गया है. इन केबलों को अगर नुकसान पहुंचता है तो सिर्फ इंटरनेट ही नहीं बल्कि बैंकिंग और ऑनलाइन कामकाज भी प्रभावित हो सकती है. जिसका असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ेगा.
फाइबर ऑप्टिक केबलों का बड़ा नेटवर्क बिछा है
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समय 2 जगह सबसे ज्यादा खतरे में है एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और दूसरी बाब अल-मंडेब स्ट्रेट, जो रेड शी में स्थित है. इन दोनों रास्तों के नीचे फाइबर ऑप्टिक केबलों का बड़ा नेटवर्क बिछा हुआ है. होर्मुज इलाके में समुद्र के अंदर सुरंगे या खतरनाक चीजें बिछाई गई हैं. जिससे जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ा है. ईरान समर्थित हूथी समूह जहाजों पर हमले कर रहे हैं. ये दोनों इलाके उन जगहों के ऊपर है जहां समुद्र के नीचे इंटरनेट केबलें बिछी होती है. हजारों किलोमीटर लंबी इन केबल के जरिए ही दुनिया का लगभग सारा इंटरनेट डेटा चलता है. ईमेल, बैंक ट्रांजैक्शन और वीडियो कॉल AI सेवाएं सब इन्हीं पर निर्भर है.
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हॉर्मुज और लाल सागर में करीब 20 बड़ी केबलें मौजूद
बता दें कि हॉर्मुज और लाल सागर इलाके में करीब 20 बड़ी केबलें मौजूद है. जिसमें से 17 केबलें लाल सागर से गुजरती हैं जो एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ती है. हॉर्मुज के रास्ते से गल्फ ब्रिज इंटरनेशनल, AEAE-1, टाटा टीजीएम गल्फजैसी, फाल्कन केबलें गुजरती हैं, जो सीधे भारत के अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्शन को मजबूत करती हैं. इन्हीं केबल के जरिए इंटरनेट चलता है. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजॉन जैसी बड़ी कंपनियों ने यूएई और सऊदी अरब में बड़े डेटा संटेर बनाए हैं, जो कि इन केबलों से जुड़े हैं. यानि दुनिया की डिजिटल जिंदगी इन्हीं समुद्री केबलों पर टिकी है.



