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मकर संक्रांति पर एकादशी का संयोग, इस दिन चावल का सेवन व दान वर्जित

मकर संक्रांति

Religious: मकर संक्रांति का पर्व बुधवार 14 जनवरी को मनाया जाएगा क्योंकि इसी दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं और इस दिन षटतिला एकादशी का व्रत भी किया जाएगा. संक्रांति और एकादशी का एक ही होना बेहद पुण्यदायी माना जा रहा है. बताया जा रहा है एकादशी का होना का संयोग 23 साल बाद बन रहा है, इससे पहले यह संयोग साल 2003 में बना था. ऐसे में भगवान विष्णु के साथ सूर्यदेव की कृपा का लाभ भी मिलेगा. ऐसे में एक सवाल लोगों के मन में एक सवाल है कि क्या  खिचड़ी बनाई जा सकती है या फिर अन्न या चावल का दान कर सकते हैं.

एकादशी के दिन अन्न व चावल वर्जित

मकर संक्रांति हिंदू धर्म का खास पर्व है. इसे देवताओं का दिन भी कहा जाता है और इसी के साथ उत्तरायण की शुरुआत मानी जाती है. सूर्य जब मकर राशि में आते हैं तो सभी के लिए सुख-समृद्धि लाते हैं. खिचड़ी का भोग लगया जाता और सेवन भी करते हैं. साथ ही चावल, दाल, अन्न, तिल, गुड़, खिचड़ी, कंबल और वस्त्र का दान अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है. लेकिन इस बार एकादशी का व्रत भी है और एकादशी व्रत में चावल का सेवन व दान करना वर्जित बताया गया है तो अब कैसे बनेगी मकर संक्रांति की खिचड़ी.

इन चीजों का करें दान

पंडितजी के अनुसार, एकादशी तिथि पर अन्न और चावल का सेवन व दान करना पूरी तरह वर्जित माना गया है. ऐसे में  चावल व अन्न को छोड़कर तिल, गुड़, साबूदाना, मूंगफली आदि चीजों का दान कर सकते हैं. आप 14 जनवरी को दान का संकल्प लेकर घर के किसी मंदिर या फिर किसी स्थान साफ स्थान पर रख दें और फिर 15 जनवरी को दान कर दें.
किस दिन खिचड़ी का सेवन करें
14 जनवरी को एकदाशी की वजह से मकर संक्रांति की खिचड़ी ना तो पका सकते हैं और ना ही सेवन कर सकते हैं. अगले दिन 15 जनवरी को गुरुवार है और इस दिन भी खिचड़ी खाना वर्जित है, ऐसा करने से गुरु ग्रह कमजोर हो जाते हैं. ऐसे में 15 जनवरी को भी खिचड़ी नहीं खा सकते हैं. ऐसे में आप 17 जनवरी को खिचड़ी का सेवन कर सकते हैं क्योंकि इस दिन शनिवार है. इस दिन आप चावल का दान भी कर सकते हैं.

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महत्व

मकर संक्रांति सनातन परंपरा का एक अत्यंत पावन और खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्व है. इसका महत्व धार्मिक, ज्योतिषीय, सामाजिक और आध्यात्मिक चारों स्तरों पर माना गया है. मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं, इसलिए यह काल अनुशासन, कर्म, परिश्रम और स्थायित्व का प्रतीक है. यह काल बहुत शुभ माना जाता है, क्योंकि इसके बाद देवताओं का दिन प्रारंभ होता है. शास्त्रों में कहा गया है कि उत्तरायण में किया गया जप, तप, दान और स्नान अक्षय फल देता है.

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